Thursday, August 2, 2012

तोहफ़ा इक वादे का


क्या इस राखी के दिन 
हम भाई अपनी बहना की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेंगे ?
हाँ सुरक्षा !
सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक सुरक्षा

अगर हाँ ?
तो दें उसे तोहफ़ा इक वादे का 

इज्ज़त, स्वमान, सामाजिक और आर्थिक आज़ादी, बराबरी का वादा 
वादा यह भी कि
बराबरी हो अधिकारों कि 
अवसर की 
रोज़ी, रोटी, कपडा, संपत्ति की
चयन की 
अमन की 
घर में और घर के बाहर भी 


इसे फेसबुक पे भी पढ़ा जा सकता है 

Tuesday, July 17, 2012

तेरे नयनों के नीर

तेरे नयनों के नीर 
बरसा गए सवालों के तीर 

असमंजस में हूँ 
ख़ुद के ज़ख्मों को देखूं 
या तेरे नयन पोंछूं 

या खुला छोड़ दूँ बहने उन्हें 
शायद एक दिन दरिया बन 
सैलाब लाए 
पानी, नमक, मवाद
को खुद में समा
साथ बहा ले जाए 
कोरा कर जाए फिर से इक दफ़ा


इसे फेसबुक पे भी पढ़ा जा सकता है 

Wednesday, July 4, 2012

मैं तो आज भीज गया

मैं तो आज भीज गया 
तेरी बारिश में आज भीज गया
तेरे आगोश में समा के मैं तो पसीज गया 
मन का मारा मरीज़ गया 

दूर बहुत ही  मैं दूर जितना गया 
तेरे करीब गया 
मैं तेरे और तू मेरे नसीब गया 
बेतरतीब सा कुछ, अबूझ-अजीब गया 

इसे फेसबुक  पर  भी  पढ़ा  जा सकता  है 




Monday, June 11, 2012

रो लेने दो

ज़ालिम बाढ़ जब आती है
सब कुछ बहा ले जाती है
बाँध ढाती है

किनारों को दूर कहीं पीछे छोड़
सारे बंधन तोड़ जाती है

उमड़-घुमड़, इधर-उधर डोलाती है
मातम बरसाती हैं
हमेशा को ज़ख्म दे जाती है
निशानी छोड़ जाती है

दोस्त मेरे
इस लिए इस दफ़ा
रोको नहीं
गले लग 
जी भर के रो लेने दो
अश्कों से मेरे रूह को मुझे धोने दो

इसे फेसबुक पे भी पढ़ा जा सकता है 

Saturday, June 9, 2012

लाल सलाम परचम लाल

ये कहानी है एक सफ़ेद चादर की
जिसके नीचे फलते थे इन्सां
खेलते थे बच्चे
चहकती थी चिड़िया
खिलती थी कलियाँ
उड़ती थी खुशबु सब के लिए

वोही सफेदी थी पहचान उनकी

फिर इक दिन हुआ क़त्ल
बलात्कार
ज़ुल्म-ओ-अत्याचार
इन्सां के इन्सां से अव्वल-अफज़ल बनते

इन्सां बटे
और बांटी  फिर  जंगल
ज़मीन, खेत, खलिहान
और पहचान

कारख़ाने बने, भट्टियाँ जली
पसीना बहा, जिस्म जला, हड्डियाँ गली

वह दिन भी आया
जब सफेदी बटी
और तकसीम हुए माओं के आँचल
और वो सफ़ेद चादर का इक टुकड़ा
जो बूढी अम्मां का आँचल बना,
बाप का तकिया बना,
वैध का पट्टी-मलहम भी बना

और ज़ख्मों का लहु पोंछ-पोंछ कर
हो गया लाल
और हाँथ भी अम्मा का रंग गया
हो गया अपने ही बच्चों के खूं से लाल

और आख़िर बना लिया उसे
उठ्ठा लिया मजलूमों ने
परचम लाल

और फिर ढ़ोल बजा, नक्कारा पिटा
नारा बना लाल सलाम !
मजदूरों के  नाम, माओं के नाम,
कोख में पलते बच्चों के नाम

बढ़ गए खोने को जंजीरें
सब के सब
होने लगे एक रंग
मजदूरों के नाम, मजलूमों के नाम
लाल सलाम परचम लाल

इसे फेसबुक पे भी पढ़ा जा सकता है 

Thursday, June 7, 2012

इंतज़ार - 3

तुमसे  मिलने की उम्मीद
हर दफ़ा नाउम्मीद कर जाती है
दिल दुखा जाती हैं
हिला जाती है

नाउम्मीद नहीं हूँ आज मैं ज़रा भी
मुझे ख़बर है
तुम नहीं आओगी

इसे फेसबुक पे भी पढ़ा जा सकता है 

Tuesday, June 5, 2012

इन्सां का रंग

इन्सां का  रंग कच्चे रंग का होता है
थोड़ा क़रीब आते ही पसीजता है
पसीजते ही रंग छोड़ता है

रंग जाता है
ज़मीन-ओ- आसमान को

खुद बदरंग हो
रंग देता है अपने ही रंग में सबको
हमेशा

इसे फेसबुक पे भी पढ़ा जा सकता है