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Wednesday, July 28, 2010

उन्हें नहीं दिखेगा ।

साढ़े चार फुट का
गठित दुबला शरीर लिए
आँखों में काजल की तीखी कलि लकीर
भंवों को तीर की मानिंद तराशे हुए
किधर चली ?
जिधर चली,
सुबह-सुबह, शहर की भागम भाग में
पलकों पर नीली हल्की धूल,
मोटे अपलक होठों पर
गाढ़ी कत्थई लिपस्टिक लगा
अपने अस्तित्व को लिए
किधर चली?

निखारने अपने सौंदर्य को इन्द्रधनुषी मेकअप से याकि
छुपाने अंतर्मन के दर्द या घावों को
जो भीतर ही भीतर पाक रहा है
बजबजा रहा है ।
अपने माथे पर पड़ी लकीर गहरी
छुपओगी कैसे ? और आँखों के नीचे
पड़ी थकान की रेखाओं को
होटों की फटी दरारों को
कैसे ?

कोई तो देकेगा उस मेकअप सज्जित
कमनीय चेहरे के पीछे का दर्द और घाव ।
देख सकेगा अन्दर का ग़म,
इन झूठी खुशिओं की लीपा पोती
झांकेगा होठों की दरारों से, भीतर गहरा ।

किसे पड़ी है, लेकिन ? ये सब देखने की और
देखने की भी तो ग़म, घाव, परेशानियां
किसका ग़म, किसका घाव, किसकी परेशानियाँ ?
एक औरत की ?
जिसने अभी-अभी ओने चौखट को लाँघ
मेट्रोपोलिटन कैपिटल में
अपने अस्तित्व को परख अजमा रही है

कोई नहीं देखेगा
तुम्हारे अंतर्मन के घावों को
क्यूंकि सब तो मंत्रमुग्ध हैं
तुम्हारे चेहरे की कमनीयता को,
तीखे तराशे भंवों को,
अपलक मोटे होंठों पर लगी गाढ़ी कत्थई
लिपस्टिक देख
और नसों को हिलाने वाली
तुम्हारी तेज़ इम्पोर्टेड
परफ्यूम की गंध सूंघ

नहीं देखेगा, कोई भी नहीं देखेगा ।
नहीं दिखेगा, उन्हें नहीं दिखेगा
नहीं दिखेगा ।