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Monday, November 1, 2010

ज़िन्दगी मुझे शिकायत है तुमसे

ज़िन्दगी मुझे शिकायत है तुझसे
तुम वक़्त ही कहाँ देती है जीने का
मिलने का, मिलाने का
मिलकर कुछ दूर साथ चल पाने का
समझने का समझाने का
अपना बनने का और अपनाने का
ज़िन्दगी तू नहीं देती है वक़्त वादा तक निभाने का
ज़िन्दगी मुझे शिकायत है तुमसे

Saturday, October 16, 2010

तस्वीर- २

जिल्द लगी ज़िन्दगी की किताब पर
खिंची जज़्बातों की
सुर्ख़-ओ-स्याह
आड़ी-तिरछी गोल-चौकोर लकीर
लकीरों के शब्द
शब्दों के चेहरे और चेहरों से शब्द
चुपचाप, ख़ुद को समेटे
अन्दर ही अन्दर
सिमटते, सहमे हुए से शब्द
और शब्दों में क़ैद तस्वीर
वोही तस्वीर
सोंचता हूँ फाड़ दूँ पन्ने को
जिस पर उकेरे हैं मैंने स्याह रोशनाई से शब्द
और बिखेर दूँ हवा में, उड़ने को, शब्दों को सारे
कर दूँ आज़ाद उन्हें, उनकी राह पर
और उघाड़ दूँ, किताब पर लगी जिल्द भी
ख़ुद भी उडू, तैरुं, बह चलूँ
हवाओं की डगर
और जिल्द बन कर मढ़ जाऊं ज़िन्दगी की किताब पर

Wednesday, September 22, 2010

ज़िन्दगी कोई गणित है क्या?

ज़िन्दगी कोई गणित है क्या?
कोई फ़ॉर्मूला कि थेओरम है

दो और दो को जोड़ दो, और चार पा लो
दो को दो से भाग दो और एक ले लो
गुणा कर दोगुना, तिगुना या फिर चार गुणा कर लो
घटा-बढ़ा, तोल-मोल कर
ब्याज चढ़ा कर भाव लगालो
ज़िन्दगी कोई गणित है क्या?
एक कविता है शायद
शब्द रहित भाव विभोर कविता
गली, मोहल्ले, चौक चौराहे पे चलने वाला हर ख़ासो-आम काम का थियेटर
अक्षर विहीन किताब है
पन्ना-पन्ना कोरा
शब्द. चित्र, झांकियां सब मेरे
अनिश्चित. अस्थिर
खुलती, बन होती
किताब खुले अगर तो
शब्द हवा में उड़ सके
चित्र पानी में तैर सके
झांकियां ज़मीं पे चल सके
और कोई पढने वाला भी उसको पढ़ सके
तो ज़िन्दगी का हिसाब फल सके
और आगे बात चल सके

ज़िन्दगी कोई गणित है क्या?
कोई फ़ॉर्मूला कि थेओरम है

ज़िन्दगी गणित है- दो

ज़िन्दगी गणित है
समझ नहीं आ रहा यार
कभी एक और एक दो की बजाए एक कर जाती है
तो कभी एक और एक मुझे ही शून्य कर जाती है
सारे फोर्मुले-समीकरण फेल
न जोड़-घटाओ का खेल
न गुणा-भाग का मेल
रेलम-पेल
हवालात-जेल
ना एक्स-वाय की रटन
ना पी-क्यू-आर का जाप
बाप रे बाप
मेरे ही हाथ से पिछवाड़े पे थाप
थप-थपाक
बख्श दे मेरे बाप
छुट्टा नहीं है फिर कभी आना
माफ़ करो आगे बढ़ो
कोई न कोई दे देगा
एक-आध आना
जब देबरा आना तो
आ कर जी भर के तबला बजाना
अभी जाओ
जिंदगी का गणित कभी और सिखाना

ज़िन्दगी गणित है-एक

ज़िन्दगी गणित है
कभी बजाए जुड़ने के घटा जाए ज़िन्दगी
हँसते-हँसते रुला जाए ज़िन्दगी
जोड़, घटाओ, गुणा और भाग में
हर सिम्त भगाए ज़िन्दगी
गोल-गोल दायरे में
मदारी के बन्दर सा नाचाय ज़िन्दगी
खुद से खुद का मजाक बनाए ज़िन्दगी
ज़िन्दगी गणित है भईया
अधूरे को पूरा और पूरे को अधुरा बना जाए ज़िन्दगी
जुड़ते-घटते कट जाए ज़िन्दगी