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Tuesday, June 21, 2011

सागर की लहरें

सागर की लहरें किनारों से टकराती
बेबाक ठोकर मारती
किनारों को आगोश में ले इक पल को
पल में बिछुड़ दूर सागर में विलीन हो जाती
रेतीले किनारों पर उंगलिओं के निशान छोड़ जाती
और फिर लापरवाह इक दफ़ा, अगली दफ़ा
आलिंगन कर किनारों में समा जाती

यूहीं बेमाने ही टकराती बार-बार, हर बार
सख्त चट्टानों को रेत कर जाती
और हर दफ़ा रेतीले किनारों पर
उंगलिओं के निशान छोड़ आगे बढ़ जाती
और रेत पर उकेरे संदेसे स्नान कर, गोता लगा
डूब-मिट
सागर हो जाते
ख़ुद बेमाने हो
किनारों कर माने बन जाते