Wednesday, September 22, 2010

मैं बुनकर जुलाहा

मैं बुनकर जुलाहा हूँ
मुझे रूई दे दो
मैं खुद ही सूत कात लूँगा
कातूंगा, बांटूंगा, बुनुंगा
कपड़े भी मैं खुद बुन लूँगा
बुनुंगा हथकरघे पर
चादर रुपहले
और बनाऊंगा तुम्हारे लिए रत दिन
चादर पीले, कत्थई, लाल, हरे
आरामदेह, मुलायम, सपनों सी
और बटु सूत कि रस्सियाँ भी
मज़बूत-अटूट
खुद सुखी खा, पानी पी लूँगा
पेट पे रस्सी बांध दूंगा
नंगी ज़मीन पे सिकुड़े-सिकुड़े
मए बीबी-बच्चों के रात अँधेरी सो लूँगा
एक पतली चादर ओढ़-ओढ़ कर

मुझे रोज़ी न सही
और रोज़ी का दाम नहीं
काम का लेकिन अंजाम तो दो
कपास दो
मेरे बुनने कि आस तो दो
इक नै आस के बदले मेरी साँस न लो
मेरा करघा, सूत, कपास ना लो
मेरा, मेरे बीबी-बच्चों का आकाश ना लो

ज़िन्दगी कोई गणित है क्या?

ज़िन्दगी कोई गणित है क्या?
कोई फ़ॉर्मूला कि थेओरम है

दो और दो को जोड़ दो, और चार पा लो
दो को दो से भाग दो और एक ले लो
गुणा कर दोगुना, तिगुना या फिर चार गुणा कर लो
घटा-बढ़ा, तोल-मोल कर
ब्याज चढ़ा कर भाव लगालो
ज़िन्दगी कोई गणित है क्या?
एक कविता है शायद
शब्द रहित भाव विभोर कविता
गली, मोहल्ले, चौक चौराहे पे चलने वाला हर ख़ासो-आम काम का थियेटर
अक्षर विहीन किताब है
पन्ना-पन्ना कोरा
शब्द. चित्र, झांकियां सब मेरे
अनिश्चित. अस्थिर
खुलती, बन होती
किताब खुले अगर तो
शब्द हवा में उड़ सके
चित्र पानी में तैर सके
झांकियां ज़मीं पे चल सके
और कोई पढने वाला भी उसको पढ़ सके
तो ज़िन्दगी का हिसाब फल सके
और आगे बात चल सके

ज़िन्दगी कोई गणित है क्या?
कोई फ़ॉर्मूला कि थेओरम है

ज़िन्दगी गणित है- दो

ज़िन्दगी गणित है
समझ नहीं आ रहा यार
कभी एक और एक दो की बजाए एक कर जाती है
तो कभी एक और एक मुझे ही शून्य कर जाती है
सारे फोर्मुले-समीकरण फेल
न जोड़-घटाओ का खेल
न गुणा-भाग का मेल
रेलम-पेल
हवालात-जेल
ना एक्स-वाय की रटन
ना पी-क्यू-आर का जाप
बाप रे बाप
मेरे ही हाथ से पिछवाड़े पे थाप
थप-थपाक
बख्श दे मेरे बाप
छुट्टा नहीं है फिर कभी आना
माफ़ करो आगे बढ़ो
कोई न कोई दे देगा
एक-आध आना
जब देबरा आना तो
आ कर जी भर के तबला बजाना
अभी जाओ
जिंदगी का गणित कभी और सिखाना

ज़िन्दगी गणित है-एक

ज़िन्दगी गणित है
कभी बजाए जुड़ने के घटा जाए ज़िन्दगी
हँसते-हँसते रुला जाए ज़िन्दगी
जोड़, घटाओ, गुणा और भाग में
हर सिम्त भगाए ज़िन्दगी
गोल-गोल दायरे में
मदारी के बन्दर सा नाचाय ज़िन्दगी
खुद से खुद का मजाक बनाए ज़िन्दगी
ज़िन्दगी गणित है भईया
अधूरे को पूरा और पूरे को अधुरा बना जाए ज़िन्दगी
जुड़ते-घटते कट जाए ज़िन्दगी

Tuesday, September 14, 2010

लात मारो आगे बढ़ो

लात मारो आगे बढ़ो
मारो, बढ़िया है, खूब मारो
फुटबाल पे मारो
मोटर साईकिल, स्कूटर के किक को मारो
साईकिल, रिक्शा के पैडल को मारो
रस्ते पे लुढ़कते पत्थर को मारो
दे दना-दन मारो
मारो लेकिन किसी के पेट पे मत मारो
मजदूर के रोज़ी पे मत मारो
किसी इंसान को मत मारो
किसी के जज्बे और जज्बात पे मत मारो
किसी के आरज़ू-अरमान पे मत मारो
किसी के ईमान पे मत मारो

मारो खूब मारो
तबियत से मारो लात
और आगे बढ़ो
चैम्पियन बनो

Thursday, July 29, 2010

उधेड़बुन

हर शाम के बाद सवेरा
लेकिन सवेरे के बाद की शाम
और उससे भी काली रात का क्या ?

हर कली का फूल
लेकिन फूल के मुरझाने का क्या ?
हर बीज का अंकुर, अंकुर का पेड़
लेकिन पेड़ के सूख कर गिर जाने का क्या?

हर युध्ध के बाद शोर
शोर के बाद की चुप्पी
लेकिन इस चुप्पी के बाद के शोर
और फिर से चुप्पी का क्या?

अकेली ज़िन्दगी में साथ
लेकिन साथ के बाद अकेली ज़िन्दगी का क्या ?

शाम-सवेरा, कली-फूल, बीज-अंकुर-पेड़, हरे पत्ते- पीले पत्ते-झाड़ते पत्ते, शोर-चुप्पी, साथ-अकेलापन

क्या है ये ?
एक मकडजाल या उधेड़बुन ?

अँधेरे, ख़ामोशी और अकेलेपन के बीच
फंसा इंसान ।

Wednesday, July 28, 2010

किसने दिखाए सपनें ?

किसने दिखाए सपनें ?
स्वप्नील, सुनहरे, सुन्दर
डरावने, जानलेवा, खूंखार, दमघोटू
क्या तुम्हे खेद है?
सपनों के बदसूरत होने का
सपनों के टूट जाने पर खेद नहीं तुम्हे?
और अगर है भी तो क्या? और क्यूँ?
किसने दिखाए सपने तुम्हे?
पूछता हूँ किसने दिखाए तुम्हे, सपने ?
तो क्यूँ है मातम, सन्नाटा, क्रंदन ?
सपनें सच हो तो अपने
और टूट जाएँ तो पराए
पूछता हूँ किसने देखे सपनें?
उठो और जिओ, हिम्मत है तो
सपनों से आगे उस सच को
जो डरावनी है शायद
लेकिन जिंदा है ।